धार। जिले के जनजातीय कार्य विभाग के छात्रावासों में व्यवस्थाओं और विद्यार्थियों की समस्याओं को लेकर लगातार सामने आ रही शिकायतों के बीच कलेक्टर राजीव रंजन मीणा ने जिले के सभी छात्रावासों की व्यवस्थाओं की निगरानी के लिए नई व्यवस्था लागू की है। इसके तहत अधिकारियों को छात्रावासों का माह में कम से कम एक बार निरीक्षण कर विद्यार्थियों से सीधे बातचीत करने और भोजन, पानी, छात्रवृत्ति, कर्मचारियों सहित अन्य समस्याओं की जानकारी लेने के निर्देश दिए गए हैं।दरअसल, पिछले करीब एक माह में जिले के चार-पांच छात्रावासों के विद्यार्थी अपनी समस्याओं को लेकर कई किलोमीटर पैदल चलकर थाने, कलेक्ट्रेट अथवा तहसील कार्यालय तक पहुंचे और अधिकारियों के समक्ष अपनी समस्याएं रखीं। विद्यार्थियों के इस तरह छात्रावासों से निकलकर कार्यालयों तक पहुंचने को गंभीरता से लेते हुए कलेक्टर ने अधिकारियों को छात्रावासों में जाकर विद्यार्थियों से सीधे संवाद करने और उनकी समस्याओं का समय पर निराकरण सुनिश्चित करने के निर्देश दिए हैं।इसी बीच जनजातीय कार्य विभाग की सहायक आयुक्त पारुल व्यास जैन द्वारा छात्रावासों की जांच के लिए विभागीय स्तर पर अलग से आदेश जारी किए जाने को लेकर सवाल उठने लगे हैं। आदेश के अनुसार सभी विकासखंडों से संबंधित कर्मचारी निर्धारित तारीखों पर धार में अपने रिकॉर्ड लेकर उपस्थित होंगे और रिकॉर्ड की जांच की जाएगी। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि जब कलेक्टर द्वारा छात्रावासों की व्यवस्थाओं की जांच और विद्यार्थियों की समस्याओं को जानने के लिए अधिकारियों को सीधे छात्रावासों में भेजने की व्यवस्था की गई है, तो विभाग द्वारा अलग से रिकॉर्ड जांच की आवश्यकता क्यों पड़ी एक छात्रावास अधीक्षक ने नाम न छापने की शर्त पर आरोप लगाया कि जांच की प्रक्रिया कई बार केवल औपचारिकता बनकर रह जाती है। उन्होंने कहा कि अधिकारियों द्वारा विद्यार्थियों से समस्याएं पूछी जाती हैं, लेकिन छात्रावास अधीक्षकों की वास्तविक समस्याओं को जानने का प्रयास नहीं किया जाता। उन्होंने कहा कि गेहूं की उपलब्धता, विद्यार्थियों की छात्रवृत्ति, कर्मचारियों की कमी, पानी की समस्या सहित कई मुद्दे ऐसे हैं, जिनका सीधा असर छात्रावास संचालन पर पड़ता है। अधीक्षक का कहना है कि यदि किसी छात्रावास में कर्मचारी कम हैं तो उसकी पूर्ति कौन करेगा, पानी की समस्या है तो उसका समाधान कौन करेगा और विद्यार्थियों से जुड़ी राशि समय पर नहीं मिल रही है तो इसकी जिम्मेदारी किसकी होगी, इन सवालों पर भी विभाग को ध्यान देना चाहिए। उनका आरोप है कि कई बार छात्रावास अधीक्षकों की समस्याओं को सुने बिना केवल विद्यार्थियों से जानकारी लेकर कार्रवाई की जाती है। इस पूरे मामले को लेकर जब कलेक्टर राजीव रंजन मीणा से चर्चा की गई तो उन्होंने कहा कि उन्हें इस संबंध में जानकारी नहीं है और वे मामले की जानकारी लेकर इसे देखेंगे। वहीं जनजातीय कार्य विभाग की सहायक आयुक्त पारुल व्यास जैन ने कहा कि जरूरी नहीं है कि हर विभागीय आदेश के लिए कलेक्टर से अनुमति ली जाए। विभाग के भी अपने अधिकार हैं। उन्होंने कहा कि छात्रावासों का ऑडिट एजीएमपी द्वारा भी किया जाता है, कन्या शिक्षा परिसरों का ऑडिट भी होता है तथा उपायुक्त कार्यालय द्वारा भी ऑडिट किया जाता है। उनके अनुसार विभागीय स्तर पर रिकॉर्ड की जांच इसी प्रक्रिया का हिस्सा है। अब सवाल यह है कि जब छात्रावासों में विद्यार्थियों की समस्याओं के समाधान के लिए कलेक्टर स्तर से निगरानी की व्यवस्था की गई है, तो विभागीय स्तर पर समानांतर जांच व्यवस्था की आवश्यकता क्यों महसूस की गई। साथ ही यह भी सवाल उठ रहा है कि छात्रावास अधीक्षकों की समस्याओं और मूलभूत व्यवस्थाओं पर विभाग कब गंभीरता से ध्यान देगा।









