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नेशन बुलेटिन धार। करुणा प्रेम और सह-अस्तित्व का सजीव उत्सव — मानव एकता दिवस।

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दिल्ली, 24 अप्रैल, 2026 — जहाँ दया में करुणा प्रेम और एकत्व की दिशा देना जागृत होती है, तब मानव अपने सीमित स्वार्थ से ऊपर उठकर सम्पूर्ण सृष्टि के कल्याण का रचनात्मक माध्यम बन जाता है। यही भाव, करुणा और मानवता की प्रेरणा को साकार रूप देने वाला पावन अवसर उस दिवस अनुभूति का प्रतीक बना, जहाँ “मानव को मानव से प्यार हो, एक-दूजे के प्रति सहयोग” का संदेश केवल शब्दों तक सीमित न रहकर हृदयों में जीवंत हुआ।

‘मानव एकता दिवस’ 24 अप्रैल को, बाबा गुरबचन सिंह जी की दिव्य स्मृति में, सतगुरु माता सुदीक्षा जी महाराज एवं निरंकारी राजपिता जी के सान्निध्य में दिल्ली के ग्राउंड नं. 8 में आयोजित हुआ। देश के साथ ही विश्व के 63 देशों में आयोजित इस कार्यक्रम ने मानवता को समर्पित एकता, प्रेम और सेवा का संदेश दिया।

सन्त निरंकारी मण्डल के सचिव आदरणीय श्री जोगिन्दर सुखीजा ने जानकारी देते हुए बताया कि समूचे भारतवर्ष के लगभग 200 स्थानों पर रक्तदान शिविरों का सफल आयोजन किया गया, जिसमें लगभग 40,000 यूनिट रक्त संकलित किया गया, जो निःस्वार्थ सेवा, परोपकार और मानवता के प्रति समर्पण का जीवंत उदाहरण है।

युगप्रवर्तक बाबा गुरबचन सिंह जी की स्मृति में यह दिवस वर्षभर चलने वाली सेवा-श्रृंखला का शुभारंभ है, जिसके अंतर्गत देशभर में लगभग 705 स्थानों पर रक्तदान शिविर आयोजित किए जाएंगे। यह करुणा और परोपकार की भावना को निरंतर सुदृढ़ करेगा।

उल्लेखनीय है कि रक्तदान की यह पुण्य परंपरा पिछले चार दशकों से निरंतर जारी है। अब तक 9,174 रक्तदान शिविरों के माध्यम से लगभग 15,00,230 यूनिट रक्त संकलित किया जा चुका है, जो मानव सेवा के प्रति निरंकारी मिशन की अटूट प्रतिबद्धता का जीवंत प्रमाण है।

मानव एकता दिवस के अवसर पर बाढ़, सूखा और अन्य प्राकृतिक आपदाओं में सेवा शिविरों का आयोजन हुआ, जिसमें जरूरतमंदों को आवश्यक सहायता उपलब्ध कराई गई। इसके अतिरिक्त चिकित्सा शिविर, वृक्षारोपण, स्वच्छता अभियान एवं पर्यावरण संरक्षण जैसे सेवा कार्य भी आयोजित किए गए, जिससे यह पहल केवल एक दिवस तक सीमित न रहकर मानवता, करुणा और उत्तरदायित्व के उत्सव का प्रतीक बनकर उभरी।

युगप्रवर्तक बाबा गुरबचन सिंह जी ने सत्य, सरलता और सद्भावना का मार्ग दिखाते हुए युवाओं को नशामुक्त जीवन अपनाने और सेवा में आगे आने का आह्वान किया। बाबा हरदेव सिंह जी ने “रक्त नाड़ियों में बहे, नालियों में नहीं” का संदेश देकर सेवा को जीवन का अनिवार्य अंग बनाया, जिसे सतगुरु माता सुदीक्षा जी महाराज निरंतर आगे बढ़ा रही हैं।

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