
*रिश्तों को सुदृढ़ बना- साध्वी प्रमुखा विश्रुतविभा*
*झकनावदा/पेटलावद:-(राजेश काॅसवा)-*
विश्व की शक्तिशाली महिलाओं में एक नाम है- इन्दिरा नूई। जब उसको अमेरिका की पेप्सिको कम्पनी ने सीइओ के पोस्ट पर नियुक्त किया तब पत्रकार साक्षात्कार लेने उसके घर पहुंच गए। पत्रकारों ने पूछा- कम्पनी में उच्च स्थान प्राप्त करने के बाद आप क्या अनुभव कर रही हैं? उसने मार्मिक उत्तर दिया- मैं विश्व की सबसे अधिक शक्तिशाली महिला हूं। लेकिन जब मैं पेप्सिको की खबर देने मां के घर गई तो मां ने इतनी बड़ी कम्पनी की सीइओ बनने पर कोई खुशी नहीं जताई। उन्होंने कहा- घर में तुम माँ, बेटी, पत्नी और बहू हो। घर और करियर को अलग-अलग रखो। अगली बार जब मेरे घर आओ तो अध्यक्ष का ताज गैरेज में रखकर आना।
यह एक घटना है, जो युवा बहिनों के लिए आदर्श है। युवती-बहिनें कितना भी विकास करे, करियर में आगे बढ़े., लेकिन जड़ें घर के साथ जुडी रहें। इससे पारिवारिक रिश्तों में मजबूती आती है। रिश्ते जीवन के अनिवार्य अंग हैं। जीवन के हर क्षेत्र में रिश्तों का महत्त्व होता है। रिश्ते दो तरह के होते हैं- 1 शूल की तरह 2 फूल की तरह। शूल की तरह विकसित होने वाले रिश्ते चुभन पैदा करने वाले होते हैं और फूल की तरह विकस्वर होने वाले रिश्ते चारों ओर परिमल फैलाने वाले होते हैं। सुखशांति के लिए, रिश्तों को सुदृढ बनाना जरूरी है और उसके लिए स्नेह, प्यार, विश्वास और धैर्य की आवश्यकता होती है।
रिश्तों को सशक्त बनाने में महिलाओं की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। प्राचीन काल में संयुक्त परिवार होते थे। एक परिवार में अनेक सदस्य साथ में रहते थे। वे एक दूसरे के सुख-दुःख में सहभागी बनते थे, एक-दूसरे का सहयोग करने के लिए तत्पर रहते थे। वर्तमान में एकल परिवार है फिर भी संबंधों में मधुरता नहीं है, रिश्तों में दूरियां नजर आती है। संबंधों में दूरी या कमजोरी आने के अनेक कारण हो सकते हैं, उनमें पांच कारण मुख्य हैं-
*1.भावात्मकता का अभाव-* रिश्तों को कमजोर बनाने वाला पहला घटक बिन्दु है भावात्मकता का अभाव। आज भावात्मक अंतरंगता का ग्राफ नीचे की ओर जा रहा है, संबंधों में आत्मीयता समाप्त हो रही है, औपचारिकता बढ़ रही है। जन्मदिन आदि विशेष अवसरों पर हेलो-हाई करके ही प्रेम का इजहार कर रहें है। एक बार एक होस्टल की छात्रा से मैंने बात की। मैंने उस छात्रा से पूछा- छात्रावास में तुम्हें अपने अभिभावकों की याद आती है क्या? उस छात्रा ने तपाक से उत्तर दिया-मेरा उनके साथ कोई लगाव नहीं रहा। बस यदा-कदा फोन पर उनसे बात कर लेती हूं। अपनापन रिश्ते में ग्लू (गोंद) का काम करता है। जितना अपनापन होगा, रिश्तों में उतनी ही शक्ति होगी।
*2.संवाद में कमी-* रिश्तों को कमजोर बनाने का दूसरा घटक तत्त्व है संवाद में कमी। संबंधों को सुदृढ बनाने के लिए संवाद जरूरी है। यदि प्रतिदिन परस्पर सब साथ बैठें, कभी अतीत में बिताए गए मधुर पलों को याद करें, कभी भविष्य की योजनाएं बनाएं, तो परस्पर आत्मीय भाव बढ़ सकता है। आज संवाद समाप्त हो रहे हैं। अभिभावक ऑफिस से लेट आते हैं। बच्चे नींद में चले जाते हैं। सुबह बच्चे जल्दी स्कूल चले जाते हैं। अभिभावकों से उनका मिलना भी मुश्किल से होता है। जब मिलेंगे नहीं, बात नहीं करेंगे तो रिश्ते कैसे बनेंगे। रिश्तों को सशक्त बनाने के लिए परस्पर संवाद की नितान्त आवश्यकता है। फेसबुक पर नहीं फेस टू फेस (face to face) बात करना आवश्यक है। संवाद से भीतर और बाहर के विवाद खत्म हो जाते हैं।
*3.पक्षपातपूर्ण दृष्टिकोण -* रिश्तों को कमजोर बनाने वाला तीसरा घटक तत्त्व है- पक्षपातपूर्ण दृष्टिकोण। परिवार का मुखिया परिवार के सदस्यों के साथ पक्षपातपूर्ण व्यवहार करता है इससे रिश्तों में विघटन हो रहा है। परिवार टूट रहे हैं। जहां परिवार में सिर्फ अपने बच्चों का ध्यान रखा जाता है, अन्य बच्चों को गौण कर देते हैं, वहां रिश्ते कमजोर हो जाते हैं। एक परिवार में दो भाई रहते थे। दोनों में बहुत घनिष्ठता थी। बच्चों में भी परस्पर अत्यधिक प्रेम था। एक दिन बड़ा भाई बाजार से खाद्य वस्तुएं (मिठाई) लेकर आया। अपने बच्चों के हाथों में थमा दी। छोटे भाई के बच्चे जब पहुंचे तो उन्हें कुछ भी नहीं मिला। बच्चों ने अपने पापा को बताया कि बड़े पापा ने मिठाई के पैकेट स्वयं के बच्चों को दे दिया। हमें कुछ भी नहीं दिया। छोटा भाई आगबबूला हो गया। बड़े भाई के पक्षपातपूर्ण दृष्टिकोण ने प्रेमपूर्ण रिश्ते को समाप्त कर दिया।
समय की अपेक्षा है कि महिलाएं रिश्तों को सुन्दर और सुदृढ बनाने का प्रयत्न करें। पारिवारिक रिश्तों और सामाजिक रिश्तों को अच्छे बनाकर नई पीढ़ी को संस्कारित बनाने से स्वस्थ परिवार व स्वस्थ समाज का निर्माण होगा।
परिवार के मुखिया का नेतृत्व निष्पक्ष होना चाहिए। मुखिया को मेघवत् होना चाहिए। जैसे बादल पक्षपात नहीं करता है। कहां बरसूं, कहां नहीं बरसूं, यह नहीं सोचता । चाहे गड्ढ़ा हो या तालाब, चाहे समुद्र हो या घड़ा। सब जगह समान रूप में बरसता है। उसकी कृपा भेदभाव रहित होती है। वैसे ही मुखिया सबके प्रति एकरुपता रखे ।
*4.उपेक्षित व्यवहार या दृष्टिकोण-* रिश्तों की नींव को खोखला करने वाला है उपेक्षित व्यवहार। जब व्यक्ति के मन में यह भावना आ जाती है कि मुझे इसकी जरूरत नहीं है तो वह दूसरों को उपेक्षित समझता है। रिश्तों को सुदृढ बनाने के लिए हर रिश्ते को सजीवता से जीना जरूरी है। घर के बड़ों की उपेक्षा संस्कारों को कमजोर करने वाली होती है। रिश्तों में उपेक्षा भाव धीरे-धीरे रिश्तों को तोड़ने वाला होता है। रिश्ते चाहे कितने भी बुरे हों, उन्हें तोड़ना नहीं चाहिए, क्योंकि पानी चाहे कितना ही गंदा क्यों न हो, वह प्यास नहीं बुझा सकता तो क्या हुआ आग तो बुझा सकता है। हर रिश्तों को कायदे के साथ जीना चाहिए, क्योंकि रिश्तों में जितना कायदा रहेगा, उतना ही फायदा होगा। हर व्यक्ति का अपना स्थान है, सम्मान है यह स्वीकार करने वाला रिश्तों को ढीला नहीं छोड़ेगा। हाथ की अंगुलियां भले ही छोटी-बड़ी है, परन्तु सबका अपना-अपना महत्त्व हैं। मात्र न अंगूठे से काम चल सकता है और ना ही अंगुलियों से। एक की कमी भी खालीपन का अहसास कराने वाली होती है। एक-दूजे के साथ सुखद रूप से जीने का एक ही तरीका है कि सबकी अपेक्षा को स्वीकार करके उसके अस्तित्व को सम्मान दिया जाए। घर का हर सदस्य अनमोल है ऐसा मानने वाला रिश्तों को मजबूती प्रदान करता है।
*5.बलिदान का अभाव-* रिश्तों को सुदीर्घकाल तक सुरक्षित रखने की आधारशिला है- बलिदान। अच्छा रिश्ता समय पड़ने पर बलिदान मांगता है। अन्यथा रिश्ता कमजोर हो जाता है। हम एक-दूसरे के लिए अपनी इच्छाओं का, अपने स्वार्थों का समर्पण करना सीखें। माता-पिता ने शिशु के पालन में अपने सुख, अपनी नींद, अपनी इच्छाओं का बलिदान किया तो वह सन्तान भविष्य में उनका सहारा बन जाती है। पर वर्तमान में बलिदान का जीवन नहीं रहा इसलिए बच्चे तो बेबी केयर सेंटर में और बूढ़े old home में पल रहे हैं। रिश्तों में समर्पण का अभाव जीवन को नीरस बना रहा है, चाहे वह मां-बेटे का हो या पति-पत्नी का या फिर कोई भी पारिवारिक रिश्ता क्यों न हो। बढ़ते तलाक के केस बलिदान के अभाव से ही बढ़ रहे है। पहले महिलाएं जीवन भर सहन कर, समर्पण कर एक अनजाने व्यक्ति के साथ रह जाती पर अब की स्थिति ये है- थोडी सी तकरार, खींचती है दीवार। ये समाज की स्थितियां तब तक नहीं बदलेगी, जब तक रिश्तों में समर्पण नहीं आएगा।
इसलिए प्रत्येक रिश्तों को सजीवता से जीने का प्रयास करना चाहिए। ये रिश्ते इन पांच कारणों से खंडप्रस्थ बनाना चाहिए, इन्हें दूर कर जीवन को इन्द्रप्रस्थ बनाना चाहिए। रिश्तों को नाजुकता से संभालना चाहिए। रिश्ते बर्फ के गोले कीतरह होते हैं, जिन्हें बनाना तो सरल, पर बनाए रखना मुश्किल है। रिश्तों को सुदृढ बनाने के लिए उसे समय और सिंचन देना चाहिए। तभी जीवन आनंदमय हो सकता है।









