
मध्य प्रदेश के जनजातीय मंत्री विजय शाह की मेहरबानी से एक स्कूल टीचर, जो मूलतः शिक्षा विभाग की है, को जनजाति कार्य विभाग में मंडल संयोजक बनाया गया। यह पद पीएससी का है, परंतु विभागीय मंत्री की कृपा से उन्हें जनजाति कार्य विभाग में पहले प्रतिनियुक्ति पर लाया गया और बाद में मंडल संयोजक के पद पर नियुक्त किया गया।

इसके बाद उन्हें इंदौर-उज्जैन संभाग के निरीक्षण दल का प्रभारी बनाया गया। जबकि निरीक्षण दल तीन सदस्यों का था, फिर भी मनीषा मिश्रा, जो मूल रूप से शिक्षिका हैं, स्वयं ही अकेले हॉस्टलों का निरीक्षण करने निकल पड़ती थीं।

अधिकतर हॉस्टलों में यह भी जानकारी सामने आई कि निरीक्षण के बजाय अन्य कार्य शुरू हो गए थे। जब इस मामले की जानकारी वरिष्ठ अधिकारियों को लगी, तो उन्होंने तत्काल मूल निरीक्षण दल को उनकी जगह पर भेज दिया।
इस मामले में जनजाति कार्य विभाग के आयुक्त तरुण राठी ने नियुक्ति आदेश जारी करते हुए निरीक्षण दल को समाप्त कर दिया।
जब अवैध वसूली की जानकारी प्रमुख सचिव, आदिम जाति कल्याण विभाग गुलशन बामरा को दी गई, तो उन्होंने कहा कि यदि वसूली की शिकायत मिली है तो जांच की जाएगी।
आखिर विभाग में क्या अधिकारियों की कमी पड़ गई थी, जो शिक्षा विभाग की एक शिक्षिका को प्रतिनियुक्ति पर लाकर पहले जनजाति कार्य विभाग में पदस्थ किया गया, फिर मंडल संयोजक बनाया गया और उसके बाद इंदौर-उज्जैन संभाग के स्थानीय निरीक्षण दल का प्रभारी बना दिया गया?
एक शिक्षिका उन हॉस्टलों का निरीक्षण कैसे कर सकती हैं, जहां प्राचार्य क्लास-वन अधिकारी होते हैं और उनके अधीन संस्थाएं संचालित होती हैं? कई हॉस्टल ब्लॉक शिक्षा अधिकारी के अधीन भी आते हैं। फिर विभाग को क्या आवश्यकता पड़ी कि दूसरे विभाग की शिक्षिका को अपने विभाग में लाकर इतनी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी गई?
निरीक्षण दल को वाहन भी उपलब्ध कराया गया, जबकि सबसे आश्चर्य की बात यह रही कि संबंधित शिक्षिका स्वयं अकेले ही निरीक्षण पर निकल जाती थीं और दल के अन्य अधिकारियों को साथ नहीं रखा जाता था।
इस मामले में हमने मंत्री विजय शाह से भी बात करने का प्रयास किया, परंतु उनसे संपर्क नहीं हो सका। वहीं, नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने कहा कि सरकार आदिवासी बच्चों के हक के साथ खिलवाड़ क्यों कर रही है? निरीक्षण दल की आवश्यकता क्या थी, और यदि निरीक्षण करना ही था तो एक शिक्षिका को ही क्यों जिम्मेदारी दी गई?
उक्त दल का गठन तत्कालीन आयुक्त श्रीमन शुक्ला द्वारा किया गया था, लेकिन उनके हटते ही नए आयुक्त तरुण राठी ने उक्त आदेश को निरस्त कर दिया।









